सुरभि जैन

संजय लीला भंसाली और आलिया भट्ट की नई फिल्म गंगुबाई काठियावाड़ी अपने अनाउंसमेंट के वक्त से ही विवादों में रही है। महाराष्ट्र में कांग्रेस के विधायक अमीन पटेल ने ‘गंगुबाई काठियावाड़ी’ का नाम बदलने की मांग की और दावा किया कि इससे काठियावाड़ शहर की छवि खराब होगी। फिल्म 1960 के दशक के दौरान मुंबई के रेड-लाइट एरिया के कामाठीपुरा की सबसे शक्तिशाली और सम्मानित ‘माफिया क्वीन’ गंगूबाई पर आधारित है। इससे पहले भी फिल्म के टीजर रिलीज के वक्त गंगुबाई के 4 अडॉप्टेड बच्चों में से एक बाबूजी रावजी शाह ने हुसैन जैदी, एक्ट्रेस आलिया भट्ट और डायरेक्टर संजय लीला भंसाली के खिलाफ केस फाइल किया था। शाह का कहना है कि जबसे फिल्म के पोस्टर्स और प्रोमो आए हैं, तबसे न केवल उन्हें, बल्कि उनके परिवार और रिश्तेदारों को भी ‘वेश्या के परिवार वाले’ कहकर प्रताड़ित किया जा रहा है।

संजय लीला भंसाली और उनकी फिल्मों का विवादों से है पुराना नाता

संजय लीला भंसाली ऐसे डायरेक्टर हैं जो अपनी फिल्मों में नए प्रयोग करने से नहीं डरते। जिसका फल उन्हें विरोध या फिल्मों के नाम बदलने के रूप में मिलता है। कभी उनकी फिल्म इतिहास के किसी कैरेक्टर की गलत छवि बनाए जाने के कारण विरोध का शिकार होती है तो कभी प्रेम को खुले रुप में दिखाए जाने के कारण। पद्मावत, रामलीला, बाजीराव मस्तानी जैसी हिट फिल्में इसके उदाहरण हैं। ये फिल्में रिलीज से पहले लोगों के गुस्से का शिकार हुई। विरोध प्रदर्शन किए गए लेकिन रिलीज के बाद बॉलीवुड में सबसे बड़ी हिट फिल्मों में से एक साबित हुईं। यह कोई पहला मौका नहीं है जब किसी महिला प्रधान फिल्म को लेकर हंगामा हो रहा है, इससे पहले भी बॉलीवुड में ऐसी कई फिल्में आईं जो अपने विषय या महिलाओं के खुलेपन के कारण बैन की गई है।

पांच फिल्में जो विवादों के बाद कर दिए गए बैन

लिपस्टिक अंडर माई बुर्का

ये चार औरतों की कहानी है जो अपनी-अपनी आज़ादी की तलाश में हैं। सेंसर ने इसे रोकते हुए अपने फैसले में लिखा, “ये फिल्म ‘महिला केंद्रित’ है। उनकी फैंटेसीज़ के बारे में है, इसमें सेक्सुअल सीन हैं, गालियां हैं, पॉर्नोग्राफिक ऑडियो है। इसके अलावा ये फिल्म समाज के किसी एक ख़ास तबके के लिए सेंसेटिव टच लिए हुए है। इसलिए इस फिल्म को सर्टिफिकेशन के लिए अस्वीकृत किया जाता है।” हालांकि ट्राइब्यूनल के फैसले के बाद यह फिल्म रिलीज की गई।

अनफ्रीडम

2015 में सीबीएफसी ने इसे पूरी तरह बैन कर दिया था। फिल्म की कहानी में लीला और सखी टेलर नाम की दो युवतियों के बीच संबंध और न्यूड सीन थे। साथ ही पुलिस वालों के द्वारा निर्वस्त्र कर पिता के सामने रेप करने जैसा बताया गया था। सेंसर में पहले चरण पर तो फिल्म को पास ही नहीं किया गया, फिल्म के डायरेक्टर से ऐसे कुछ दृश्यों को काटने के लिए कहा गया लेकिन मना कर देने पर और उसके बाद अपीलिएट ट्रिब्यूनल के पास जाने के बाद भी यह फिल्म बैन हो गई।

फायर

1998 में दीपा मेहता की डायरेक्ट की गई फिल्म फायर को भारत में बैन कर दिया गया। फिल्म में सीता और उसकी जेठानी राधा की कहानी है, जिसमें दोनों के करीब आने और शारीरिक संबंध स्थापित करने के साथ नंदिता दास और शबाना आजमी के न्यूड सीन फिल्माए गए हैं। जिसे लेकर बहुत विवाद हुआ। सेंसर बोर्ड ने कंटेंट तो पास कर दिया लेकिन कैरेक्टर के नाम सीता को लेकर फिर विवाद हुआ कहा गया कि सीता नाम की कोई युवती अपने मन में समलैंगिक इच्छाएं नहीं रख सकती। अंत में डायरेक्टर को कैरेक्टर का नाम बदलना पड़ा।

बैंडिट क्वीन

मर्दवादी समाज की बर्बरता से पीड़ित एक दलित महिला की कहानी पर आधारित यह फिल्म भी काफी विवादों में रही थी। इसका मुख्य किरदार बाद में जाकर डाकू बना। जब फिल्मों को सभी सच्ची घटनाओं के आधार पर करवाया गया तो सेंसर बोर्ड को इस बात से झटका लगा और भारत में फिल्म को बैन कर दिया गया क्योंकि फिल्म में एक ऐसा सीन था जिसमें मुख्य किरदार फूलन देवी को ऊंची जाति के लोगों के द्वारा गांव के बीच नंगा कर कुएं पर पानी लेने के लिए भेजा गया था। इन दृश्यों को लेकर बहुत विवाद हुआ। फिल्म को बैन करने की राजनीतिक वजहें भी थीं।

एंग्री इंडियन गॉडेसेज़

अपनी दोस्त की शादी होने की बात को सेलिब्रेट करने के लिए कुछ महिलाएं एक जगर कटी होती है ना वो खुलकर एंजॉय करती हैं। परंपरावादी सेंसर बोर्ड को यह ऊपर माइंडेड महिलाएं पसंद नहीं आई और उन्होंने फिल्म को बैन करने की बात की। बोर्ड ने ‘सरकार’, ‘इंडियन फिगर’ और ‘आदिवासी’ जैसे शब्दों के इस्तेमाल पर आपत्ति की। यहां तक कि इस महिला प्रधान फिल्म में काली मां की फोटो तक बोर्ड को खटक गई। जबकि इसी फिल्म को दुनिया भर के फिल्म फेस्टिवल्स में पसंद किया गया।