सुरभि जैन

पेशावर विश्वविद्यालय (यूओपी) ने हाल ही में महिला छात्रों और शिक्षकों के लिए सख्त ड्रेस कोड लागू करते हुए आधुनिक पोशाक पर पूरी तरह से बैन कर दिया है। वहीं दूसरी और स्विट्जरलैंड में हिजाब को बैन करने पर लोग सड़कों पर उतर आए हैं। दोनों ही मामलों में बवाल हुआ और देश-दुनिया से ज्ञान की बातें भी सामने आईं। कुछ का कहना है कि यह फैसला महिलाओं के प्रति रूढ़ीवादी दृष्टिकोण को बढ़ावा देता है। यूनिवर्सिटी ने एक ड्रेस कोड पेश किया है, जिसमें फीमेल स्टूडेंट्स को सफेद सलवार कमीज पहनने के लिए कहा गया है। हिजाब बैन को लेकर मुस्लिम समूह आलोचना करते हुए इसे मुसलमानों के लिए एक ब्लैक डे बता रहे हैं।

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर महिलाओं को बराबरी और उनके हक की बात तो जोरों से की गई। लेकिन हकीकत तो यह है कि 21वीं सदी में भी समाज महिलाओं के पहनावे पर ही अटका है। जेंडर इक्वलिटी और शिक्षा की उच्च गुणवत्ता पर ध्यान देने के बजाय उन्हें सलीकेदार पूरे कपड़े पहनना सिखाया जा रहा है तो कहीं उनके साथ हुए बलात्कार या किसी भी अनुचित घटना के लिए उनके कपड़ों को जिम्मेदार ठहराया जाता है। सवाल यह है कि आखिरकार हर बात घूम फिरकर महिला के कपड़ों पर ही आकर क्यों टिक जाती है, समाज की सामूहिक मानसिकता पर आखिर कोई सवाल क्यों नहीं उठाता…

एक शोध यह भी… महिलाओं को प्रताड़ित करने और उनका शोषण करने में पुरुषों को मज़ा आता है

2016 में मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका में पुरुषों और महिलाओं पर की गई स्टडी में संयुक्त राष्ट्र महिला विभाग ने पाया कि पुरुषों द्वारा सड़क उत्पीड़न के पीछे मुख्य कारण है- मज़ा आना। महिलाओं को प्रताड़ित करने और उनका शोषण करने में पुरुषों को मज़ा आता है। ये कारण अपने आप में जितना हास्यास्पद है, उतना ही खून खौलाने वाला भी। पुरुषों द्वारा सड़कों पर महिलाओं के साथ छेड़छाड़ का कारण सिर्फ मज़ा नहीं है, बल्कि कई पुरुषों ने अपने द्वारा किए गए छेड़छाड़ के लिए महिलाओं के कपड़ों को दोषी ठहराया। स्टडी में पाया गया कि 74% पुरुषों ने महिलाओं को उनके भड़काऊ कपड़ों की वजह से परेशान किया।

मानसिकता ऐसी… छोटे कपड़े पहनना, देर रात घूमना परेशानी को बुलावा देना ही है

महिलाओं के साथ उत्पीड़न के लिए उनके कपड़ों की लंबाई को जिम्मेदार ठहराने में पुरुषों की तुलना में महिलाएं कम नहीं हैं, लगभग 85% महिलाएं इस बात को मानती हैं कि ‘भड़काऊ कपड़े पहनने वाली महिलाएं प्रताड़ना के योग्य हैं’ जबकि 43% महिलाओं ने इस बात को माना कि ‘जो औरतें रात में घर के बाहर घूमती रहती हैं दरअसल वो खुद परेशानी को बुलावा देती हैं’।

एक मानसिकता यह भी… कम कपड़े पहनने वाली महिलाएं अधिक समझदार होती हैं

यूनिवर्सिटी ऑफ बेडफोर्डशायर के डॉक्टर अल्फ्रेडो गैटन के करीब 64 अंडरग्रेजुएट्स जिसमें उन्हें कुछ छोटी स्कर्ट और टॉप पहने हुए महिलाओं को दिखाया तो कुछ में लंबी स्कर्ट और शरीर को लगभग पूरा ढकने वाले टॉप पहना दिखाया गया और वफादारी, नौकरी, पर्सनैलिटी आदि मानको पर पॉइंट देने को कहा गया। तस्वीरों को देखने के बाद ज्यादातर लोगों ने माना है कि छोटे कपड़े पहनने वाली लड़कियां अपेक्षाकृत ज्यादा समझदार नजर आती हैं। हालांकि गैटन मानते हैं कि छोटे कपड़े पहनने वाली लड़कियों को अब भी नकारात्मक माना जाता है लेकिन उनके सेक्सी लुक को सकारात्मकता के साथ देखा जाता है।

लोग तो कपड़े पहनने के तौर तरीके को बलात्कार की घटनाओं से जोड़ रहे हैं

कई महिला एक्टिविस्ट के अनुसार, लोग यह नहीं समझते हैं कि शालीनता की परिभाषाएं हमेशा से बदलती रही हैं और बलात्कार इसलिए नहीं होता कि महिलाएं क्या पहनती हैं बल्कि इसलिए होता है कि लोग कैसे और क्या सोचते हैं। हरियाणा के गुड़गांव में बने शॉपिंग मॉल में एक अधेड़ उम्र की महिला की टिप्पणी पर बना एक वीडियो वायरल हो गया जिसमें वह कथित तौर पर कह रही हैं कि छोटे कपड़े पहनने वाली लड़कियों साथ बलात्कार होना चाहिये। वहीं, साल 2016 में अफ्रीकन टूरिस्ट पर हुए हमले पर दक्षिणी दिल्ली के डीसीपी ईश्वर सिंह ने कहा, “महिलाओं ने ‘उस तरह’ के कपड़े पहने थे, उनका पहनावा स्थानीय लोगों के अनुरूप नहीं था। इन दोनों की मम्मी कपड़ों को बलात्कार के लिए जिम्मेदार ठहराने वाले अच्छे खासे पढ़े-लिखे हैं और अब इस केस में सवाल मानसिकता पर उठना चाहिए।