• हैदराबाद के रास्ते बंगाल फतह करना चाहती है भाजपा

नई दिल्ली. ऐसा पहली बार हो रहा है जब एक स्थानीय निकाय चुनाव पर देश की नजर टिका दी गई। संभवतः ऐसा भी पहली बार ही हुआ जब एक निकाय चुनाव में बीजेपी ने अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष, केंद्रीय गृह मंत्री, दूसरे प्रदेश के मुख्यमंत्री समेत कई राष्ट्रीय नेताओं को प्रचार में उतार दिया। परिणाम भी उसी के अनुरूप रहा। एआईएमआईएम के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी और के. चंद्रशेखर राव के गढ़ हैदराबाद में बीजेपी ने परचम लहरा दिया। परिणाम के बाद गृहमंत्री अमित शाह ने शुक्रवार देर शाम एक ट्वीट कर कहा कि तेलंगाना की जनता ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी की विकास की राजनीति में भरोसा जताया है। पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा और तेलंगाना के पार्टी अध्यक्ष बंडी संजय कुमार को बधाई। मैं कार्यकर्ताओं की कड़ी मेहनत को सलाम करता हूं। अमित शाह ने यही ट्वीट तेलुगु में भी किया है। अमित शाह का यह ट्वीट लोकसभा, विधानसभा या राज्यसभा चुनाव के संदर्भ में नहीं आया है बल्कि हैदराबाद के निगम के चुनाव में बीजेपी की सफलता के लिए था।

ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम (जीएचएमसी) के चुनाव को बीजेपी ने अपनी नाक की लड़ाई बना ली थी और इसे जीतने के लिए पूरी ताकत झोंक दी थी। बीजेपी हैदराबाद की जीत का जश्न इसलिए भी जोर-शोर से मना रही है क्योंकि ग्रेटर हैदराबाद शहर क्षेत्र में 30 फीसदी से ज्यादा आबादी मुस्लिम समुदाय की है। कई सीटों पर मुस्लिम आबादी निर्णायक वोट के रूप में हैं। वहीं, बंगाल में भी 27 फीसदी आबादी मुस्लिमों की है और करीब आधी सीटों पर निर्णायक भूमिका में हैं। इसलिए बीजेपी उत्साहित नजर आ रही है।

2016 में बीजेपी यहां सिर्फ 4 सीट जीत पाई थी तो इस चुनाव में 48 सीटें जीतकर टीआरएस के बाद दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। हैदराबाद में खासा दबदबा रखने वाली ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम 44 सीटों के साथ तीसरे नंबर पर खिसक गई है। कुल 150 सीटों में से टीआरएस को पिछली बार के 99 सीटों के मुकाबले इस बार 55 सीटें ही हासिल हुईं।

तेलंगाना में बीजेपी का जनाधार कम रहा है। राज्य में चंद्रशेखर राव की पार्टी टीआरएस और राजधानी हैदराबाद में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम का ज्यादा प्रभाव है।   

बीजेपी की रणनीति इतनी आक्रामक क्यों?

बीजेपी अब तक जहां सरकार नहीं बना पाई है, उन सभी जगहों पर बेहद आक्रामक रणनीति अपना रही है। आखिर इतनी आक्रामकता देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस या दूसरे विपक्षी दलों में देखने को क्यों नहीं मिल रही। राजनीतिक विश्लेषक और स्वराज इंडिया पार्टी के अध्यक्ष योगेंद्र यादव मानते हैं कि बीजेपी की चुनाव में कामयाबी दरअसल बीजेपी की जीत से ज्यादा विपक्षी पार्टियों की विफलता अधिक है। बिहार चुनाव में जेडीयू-बीजेपी नीत एनडीए की जीत और आरजेडी-कांग्रेस के नेतृत्व में महागठबंधन की हार के बाद भी योगेंद्र यादव ने कहा था कि ये सीधे तौर पर सेक्युलर पॉलिटिक्स करने वाली पार्टियों की नाकामी है।  

इस बीच, शुरुआती रुझानों में बीजेपी को बढ़त मिलने के बाद वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम ने ट्वीट किया, ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम के चुनाव में बीजेपी को काफी बढ़त। एक निगम के चुनाव में बीजेपी ने पूरी ताकत झोंक दी। नतीजा सामने है। ऐसा लग रहा है कि ओवैसी और टीआरएस के गढ़ में बीजेपी को जबरदस्त कामयाबी मिलने जा रही है।

बीजेपी ने बंगाल और केरल को बनाया मिशन

पश्चिम बंगाल में बीजेपी की कभी सरकार नहीं बन पाई है। पिछले विधानसभा चुनाव में उसे 3 सीटें मिली थीं। इसमें उसका वोट प्रतिशत 10.16% रहा था। वहीं, साल 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को राज्य की कुल 42 लोकसभा सीटों में से 18 पर जीत मिली थी। पूरे राज्य में 40.64% वोट मिले थे। बीजेपी ने दावा किया है कि इस बार बंगाल में उसकी सरकार बनेगी। राज्य में अगले साल अप्रैल-मई के मध्य विधानसभा चुनाव होने हैं।  

बंगाल के साथ ही केरल में भी विधानसभा चुनाव होने हैं और दोनों राज्यों में बीजेपी की स्थिति कमोबेश एक जैसी रही है। यहां भी बीजेपी कभी सरकार नहीं बना पाई है। 2016 में हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी को सिर्फ एक सीट मिली थी। लेकिन, बंगाल के साथ केरल लंबे समय से उसके एजेंडे में ऊपर रही है।

बीजेपी का कैडर मजबूत हो रहा है

सवाल यह भी है कि बीजेपी हर चुनाव के लिए आक्रामक रणनीति बना रही है। दूसरी तरफ मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस का कैडर कमजोर हो रहा है। इसका ताजा उदाहरण बिहार विधानसभा चुनाव है। बिहार चुनाव प्रचार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने जितना जोर लगाया, कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने अपनी मौजूदगी नहीं दिखाई बल्कि वे इस चुनाव से कटे-कटे से दिखे। पहले बीजेपी शहरी पार्टी के तौर पर मानी जाती थी, जिसका उच्च मध्यम वर्ग वोटर है। लेकिन 2014 के बाद से शहरों से निकलकर गांव-गांव तक पार्टी का कैडर मजबूत हुआ है। किसी भी चुनाव के लिए उसके पास बूथ स्तर तक की रणनीति होती है।

राहुल गांधी नहीं दिखा पा रहे निरंतरता

कांग्रेस नेता राहुल गांधी के नेतृत्व पर सवाल उठते रहे हैं

इस बीच, कांग्रेस की सहयोगी पार्टी एनसीपी के प्रमुख शरद पवार ने राहुल गांधी पर बयान दे दिया। उन्होंने कहा कि उनमें कुछ हद तक निरंतरता की कमी लगती है। एक इंटरव्यू में उनसे पूछा गया था कि क्या राहुल गांधी को नेता मानने के लिए देश तैयार है? इसपर पवार ने कहा कि इस संबंध में कुछ सवाल जरूर हैं। उनमें निरंतरता का अभाव है। हालांकि शरद पवार ने हाल में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा की किताब में राहुल गांधी के बारे में की गई टिप्पणी पर आपत्ति जताई। पवार ने कहा कि मैं अपने देश के नेतृत्व के बारे में कुछ भी कह सकता हूं। लेकिन किसी दूसरे देश के नेतृत्व या नेता के बारे में मैं बात नहीं करूंगा। हर किसी को एक सीमा बनाए रखनी चाहिए और मुझे लगता है कि ओबामा ने उस सीमा को लांघा है। बता दें कि ओबामा ने राहुल गांधी के बारे में अपनी नई किताब में लिखा है कि राहुल गांधी में योग्यता और जुनून की कमी है।