सुरभि जैन

रंगों का त्योहार है, जिस तरह भारत के बारे में जो आकर्षक है, वह भाषा, संगीत, बोली, कपड़े और लगभग सभी चीजों का मिश्रण है यही हाल होली का भी है। जिस तरह से यह उत्तर भारत में मनाया जाता है, आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि दक्षिण में, होली पूरी तरह से अलग पर्व व तरीके से मनाई जाती है। आज पूरा देश इस रंगीन त्यौहार को मना रहा है फिर चाहे वह कोरोना के चलते सोशल डिस्टेंसिंग के साथ ही क्यों ना हो। ऐसे में द न्यूजिश आज बता रहा है देश के विभिन्न हिस्सों में इस रंगीन त्योहार को मनाने के अनूठे तरीकों और इससे जुड़े रिवाजों के बारे में

कुल्लू जहां होली से 40 दिनों पहले ही शुरू हो जाता है रंग लगाना

हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में बसंत पंचमी से ही लोग गुलाल से होली खेलना शुरू कर देते हैं। 40 दिनों की ये होली तब जाकर खत्म होती है, जब पूरे देश में होली का पर्व मनाया जाता है। दरअसल, कुल्लू के रघुनाथपुर मंदिर में सबसे पहले बसंत पंचमी के दिन भगवान रघुनाथ पर गुलाल चढ़ाया जाता है, लोगों का ऐसा मानना है कि रामायण काल में हनुमान ने इसी जगह पर भरत से मुलाकात की थी। यही वजह है कि सबसे पहले भगवान रघुनाथ की रथ यात्रा निकाली जाती है, जहां ट्रेडिशनल तरीके से भगवान रघुनाथ पर गुलाल फेंका जाता है भगवान रघुनाथ पर गुलाल फेंकते ही होली का आगाज हो जाता है।

उत्तर प्रदेश का बरसाना ग्राम जहां खेली जाती है लट्ठमार होली

उत्तर प्रदेश में मथुरा से लगभग 27 किलोमीटर दूर स्थित बरसाना की होली, जिसे लठ्ठमार होली के नाम से जाना जाता है, देश के प्रसिद्ध तीर्थस्थलों में से एक है, और यह राधा का जन्मस्थान भी है। यहां होली केवल रंगों के साथ ही नहीं बल्कि लठ्ठों के साथ मनाई जाती है। कहा जाता है कि भगवान कृष्ण ने बरसाना में अपनी प्रेयसी राधा और उनके दोस्तों को छेड़ा था तब बरसाना की महिलाओं ने उनका पीछा किया। तब से, परंपरा यह है कि महिलाएं होली के दौरान पुरुषों का लाठियों से पीछा करती हैं।

पंजाब में खेली जाने वाली ऐसी होली जहां पहले होता है युद्ध कौशल का प्रदर्शन

निहंग सिखों द्वारा होली के एक दिन बाद होला मोहल्ला मनाया जाता है। 10 वें सिख गुरु, गुरु गोविंद सिंह ने समुदाय के मार्शल कौशल को विकसित करने के लिए होला मोहल्ला उत्सव की शुरुआत की। होला मोहल्ला, जिसे देश के इस हिस्से में योद्धा होली के रूप में भी जाना जाता है, योद्धाओं द्वारा कुश्ती, मार्शल आर्ट, मॉक तलवार के झगड़े में भाग लिया जाता है। योद्धा अपने साहस और ताकत का प्रदर्शन करने के लिए ये स्टंट करते हैं। योद्धा कविताएँ भी सुनाते हैं, जिसके बाद रंगों के साथ रंग-बिरंगी होली मनाई जाती है।

पश्चिम बंगाल का बसंत उत्सव जहां पालकी के साथ निकलता है जुलूस

पश्चिम बंगाल में वसंत ऋतु के स्वागत के लिए बसंत उत्सव या दोल जात्रा मनाया जाता है। शांतिनिकेतन में विशेष उत्सव इस दिन होता है। लोग भगवान कृष्ण को पूजते हैं। इस दिन भक्त, राधा और कृष्ण की मूर्ति को पालकी में रखते हैं, जिसे पूरी तरह से कपड़े, फूल और पत्तियों से सजाया जाता है। भक्त फिर पालकी को झूला झुलाकर और नाचते-गाते हुए जुलूस के लिए आगे बढ़ते हैं। पुरुष पाउडर छिड़कते हैं जिसे अबीर माना जाता है।

महाराष्ट्र में होता है रंगपंचमी का जोरदार आयोजन

देश का यह हिस्सा होली के त्योहार को सबसे रोमांचक तरीके से मनाता है। लोग होलिका के पुतले को जलाने के बाद उत्सव की शुरुआत करते हैं, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। यह समारोह पूर्णिमासी दशमी पर सूर्यास्त के बाद आयोजित किया जाता है। अगले दिन, जिसे फाल्गुन कृष्णपक्ष पंचमी कहते है, रंगपंचमी कहा जाता है। लोग ‘गुलाल’ इकट्ठा करते हैं और एक दूसरे पर पानी छिड़कते हैं।

केरल की मंजुल कुली होली खेली जाती है हल्दी से

दिलचस्प बात यह है कि भारत के अधिकांश दक्षिणी हिस्सों में होली को बहुत उत्साह के साथ नहीं मनाया जाता है, यहां मुट्ठी भर समुदायों के लोग रंग के इस त्योहार को मनाते हैं। केरल में होली को मंजुल कुली के नाम से जाना जाता है, जिसे गोसरीपुरम थिरुमा के कोंकणी मंदिर में मनाया जाता है। पहले दिन जहां श्रद्धालु मंदिर आते हैं, वहीं दूसरे दिन लोग एक दूसरे पर रंगीन पानी छिड़कते हैं, जिसमें हल्दी होती है और पारंपरिक लोक गीतों पर नृत्य किया जाता है।

गोवा में लोग सड़क पर मनाते हैं होली नावों को भी सजाया जाता है

देश के इस हिस्से में, लोग पारंपरिक लोक और सड़क नृत्य के साथ इस त्योहार का आनंद लेते हैं। इस समय के दौरान, नौकाओ को अलग अलग थीम पर सजाया जाता है। शिग्मो उत्सव के दो रूप हैं- ढाक्टो शिग्मो और वाध्लो शिग्मो, जिसका अर्थ है छोटा और बड़ा। ग्रामीण आबादी, विशेष रूप से श्रमिक वर्ग और किसान, ढाक्टो शिग्मो को मनाते हैं, जबकि सभी वर्ग के लोग वाध्लो शिग्मो को मनाते हैं।

काशी जहां खेली जाती हैं चिता की राख से होली

देश के महातीर्थ स्थानों में से एक काशी जहां के मणिकर्णिका घाट पर होली में रंग, गुलाल या पिचकारी नहीं चलती बल्कि होली खेली जाती हैं चिता की भस्म से । जी हां यहाँ होली से पूर्व आने वाली एकादशी पर चिता की राख को बाबा विश्वनाथ के चरणों मे रख फिर होली खेली जाती हैं । मान्यता है कि इस दिन महादेव , गौरा को ब्याहने के बाद जब उनकी विदाई करा कर लाये तो इसी घाट पर अपने साथियों के साथ चिता की राख से यहां उन्होंने होली खेली थी । प्रतिवर्ष ये आयोजन काशी के महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर होता है मगर इस साल हरिश्चंद्र घाट पर भी इसका आयोजन किया गया था ।